chhath puja: छठ पूजा है दुनिया का कठिन व्रत, पौराणिक महत्वता

chhath puja: बिहार में छठ पूजा विशेष रूप से मनाया जाता है. छठ केवल पर्व नहीं इसमें बिहारियों की अधिक आस्था जुड़ी हुई है. इस व्रत को पूरे 4 दिन तक बहुत ही पवित्रता के साथ मनाया जाता है. बता दें कि नहाय- खाय से इसकी शुरूआत की जाती है, जो उगते हुए सूर्य को […]

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chhath puja: बिहार में छठ पूजा विशेष रूप से मनाया जाता है. छठ केवल पर्व नहीं इसमें बिहारियों की अधिक आस्था जुड़ी हुई है. इस व्रत को पूरे 4 दिन तक बहुत ही पवित्रता के साथ मनाया जाता है. बता दें कि नहाय- खाय से इसकी शुरूआत की जाती है, जो उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त किया जाता है. किन्तु ये पर्व वर्ष में 2 बार मनाया जाता है, पहला चैत मास शुक्ल पक्ष षष्ठी को, दूसरा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाया जाता है. पुरानी मान्यता है कि, इस व्रत के करने से मन इच्छित फल की प्राप्ति होती है.

छठ की पौराणिक महत्वता

एक पुरानी कथा के मुताबिक प्रियव्रत नामक एक राजा की कोई संतान होती थी. जिसके कारण वह अधिक परेशान रहता था, उसने जीवन के हर जतन कर डाले राजा की कोई संतान नहीं हुई. इस दौरान उनकी मुलाकात महर्षि कश्यप से हुई, उन्होंने ही राजा को पुत्रयेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी.

ज्योतिर्मय विमान धरती पर उतरा

जब राजा ने पूरे विधि विधान से यज्ञ किया तो महारानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, परन्तु शिशु मरा पैदा हुआ. राजा के मृत बच्चे की सूचना पाकर पूरा गांव शोकमय हो गया. इस पूरी घटना के उपरांत राजा बच्चे को दफनाने की तैयारी में थे, तभी अचानक आसमान से एक ज्योतिर्मय विमान धरती पर उतर आया. जिसमें बैठी देवी ने कहा मैं षष्ठी देवी हूं, विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूं. जिसके बाद देवी ने शिशु के मृत शरीर को छुआ, उनके स्पर्श मात्र से बच्चे की सांसे चलने लगी. वहीं इस घटना के बाद से लोग षष्ठी देवी की उपासना करते हैं.

छठ व्रत की विशेषता

बता दें कि छठ व्रत को पूरे चार दिन तक मनाया जाता है. जिसमें व्रती कई घंटों का उपवास रखती हैं, जिसके लिए वह पानी में घंटो खड़ी रहकर सुर्य के डूबते का इंतजार करती है, फिर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है. इतना ही नहीं इसकी समाप्ति उगते सुर्य को अर्घ्य देकर किया जाता है.