केरल: भाजपा नेता जॉर्ज की अग्रिम जमानत याचिका खारिज, अदालत ने कहा- "गलत संदेश जाएगा"

कोच्चि :  केरल उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को भाजपा नेता पी.सी. जॉर्ज की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया, जो एक टेलीविजन बहस के दौरान दिए गए कथित भड़काऊ बयान से संबंधित थी. अदालत ने इस फैसले में कहा कि ऐसे बयान समाज में गलत संदेश फैलाते हैं और इन्हें रोका जाना चाहिए. 

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Courtesy: social media

कोच्चि :  केरल उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को भाजपा नेता पी.सी. जॉर्ज की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया, जो एक टेलीविजन बहस के दौरान दिए गए कथित भड़काऊ बयान से संबंधित थी. अदालत ने इस फैसले में कहा कि ऐसे बयान समाज में गलत संदेश फैलाते हैं और इन्हें रोका जाना चाहिए. 

न्यायालय का फैसला

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा, "राजनेताओं को समाज के लिए आदर्श बनना चाहिए." अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म, जाति या अन्य संवेदनशील मुद्दों पर भड़काऊ बयान देना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है. कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि संसद और विधि आयोग को इस पर विचार करना चाहिए कि क्या ऐसे मामलों में अपराधियों को जुर्माना देकर छोड़ देना उचित होगा. 

जमानत की शर्तों का उल्लंघन

न्यायमूर्ति पी.वी. कुन्हिकृष्णन ने कहा कि भाजपा नेता को 2022 में जमानत दी गई थी, जिसमें यह शर्त थी कि वे इस प्रकार के बयान नहीं देंगे. हालांकि, जॉर्ज ने उन शर्तों का उल्लंघन किया, जिसके कारण अदालत ने उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया. अदालत ने यह भी कहा कि अगर इस प्रकार के मामलों में राहत दी जाती है, तो यह समाज में गलत संदेश भेजेगा.

मामला और शिकायत

यह मामला कोट्टायम जिले के एराट्टुपेट्टा पुलिस स्टेशन में दर्ज किए गए मामले से जुड़ा है. मुस्लिम यूथ लीग के नेता मुहम्मद शिहाब ने भाजपा नेता पी.सी. जॉर्ज के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि जॉर्ज ने एक टीवी बहस में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाला बयान दिया. 

आगे की कार्रवाई

कोट्टायम जिला सत्र न्यायालय ने जॉर्ज की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की थी, जिसके बाद भाजपा नेता ने उच्च न्यायालय का रुख किया था. अब उच्च न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राहत देने से इनकार कर दिया है. 

यह निर्णय समाज में राजनेताओं द्वारा दिए जाने वाले भड़काऊ और नफरत फैलाने वाले बयानों के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया का संकेत देता है. अदालत का कहना है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जरूरत है, ताकि समाज में धार्मिक और जातीय सौहार्द बना रहे. 
 

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